पाइए भरपूर लाभ करें ‘श्री विधि’ से धान की खेती

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जैविक खेती में किसान धान की खेती के लिए “श्री विधि” को अपना कर पानी की बचत और उत्पादन को भी बढ़ा सकता है। सीमांत एवं लघु कृषक “श्री विधि” से रोपाई करने पर परम्परागत विधि की अपेक्षा डेढ-दो गुणा अधिक उत्पादन ले सकते है। इस विधि से धान की रोपाई करने से पौधों की जड़ों का विकास अधिक होता है तथा पानी को खेत के अन्दर खड़ा नहीं किया जाता है। केवल खेत में नमी बनाये रखी जाती है।

श्री विधि
आधुनिक और उन्नत तरीके से श्री विधि द्वारा धान की खेती, के अंतर्गत बिचड़ा खेत की सूखे में 2 या 3 बार जुताई की जाती है जिससे मिटटी नम हो जाती है और घास तथा कीड़े खत्म हो जाते हैं इस मिटटी में करीब 50 किलो सड़ा हुआ गोबर या भरमी कम्पोस्ट मिला दिया जाता है. वर्षा होने पर खेत को 2 या 3 बार जोत दिया जाता है और अंतिम जोताई में 2 किलो यूरिया, 4 किलो डी.ए.पी. एवं 1 किलो पोटाश मिलाकर छिट दिया जाता है और पौकी चलाकर समतल बना दिया जाता है । बीज का उपचार करने के लिए एक बाल्टी में दो मग पानी लेके अंडा या आलू डालकर देखेंगे की वो डूब जाता है फिर उसमे नमक डालकर घोल बनाते हैं और देखते हैं कि अंडा या आलू उसमे तैरने लगता है। अब इसमें धान को डाल दें और हाथ से मिला दें, जो धान ऊपर आ जाये उसको निकालकर बहार फेंक देते हैं। अब नमक घोल से धान को निकलकर बांस कि टोकरी पर फैला देते हैं जिससे धान से पानी निकल जाता है और सिर्फ नमी रह जाने पर प्रति किलो बीज में 2 ग्राम वेवसटीनिया विटवेक्स मिला कर जुट के बोरे में बांध कर ठंडी जगह में रख दिया जाता है। 24 घंटे के अंदर अंकुरण आना शुरू हो जाता है अब इस अंकुरित बीज को प्रत्येक बेड में आधा किलो के हिसाब से फैला दिया जाता है और इसके ऊपर सुखा गोबर या राख या वर्मी कम्पोस्ट छिड़क दिया जाता है ताकि इस पर चिड़िया कि नज़र न पड़े और बीज तथा खेत सुरक्षित रहे. यह पौधा 8 से 15 दिनों में रोपने लायक हो जाता है।
नर्सरी की 2 या 3 बार सूखी जोताई की जाती है जिससे यह हलकी और भुरभुरी हो जाती है. यह ध्यान अवश्य रखा जाता है की इसकी ऊँचाई ज़मीन से 3 से 4 इंच तक रहे. इसके चारों ओर 9 इंच की लकड़ी की पट्टी लगायी जाती है ताकि नर्सरी से मिटटी बाहर न आये ।

खेती की तैयारी
खेती की तैयारी परंपरागत तरीके से ही की जाती है केवल इतना ध्यान रखा जाता है की ज़मीन समतल हो. पौध रोपण के 12 से 24 घंटे पूर्व खेत की तैयारी करके एक से तीन सेमी से ज्यादा पानी खेत में नहीं रखा जाता है. पौधा रोपण से पूर्व खेत में मार्कर से 10X10 इंच की दूरी पर निशान लगाया जाता है. पौधे के बीच उचित लाइन बना ली जाती है. इससे निशान बनाने में आसानी होती है. निशान लगाने का काम पौधा रोपण से 6 घंटे पूर्व किया जाता है ।

नर्सरी से पौधा उठाने का तरीका
इसके अंतर्गत 15 दिनों के पौधे को रोपा जाता है, जब पौधे में 2 पत्तियां निकल आती है. नर्सरी से पौधों को निकालते समय इस बात की सावधानी रखी जाती है की पौधों के तने व जड़ के साथ लगा बीज न टूटे व एक-एक पौधा आसानी से अलग करना चाहिए और पौधे को 1 घंटे के अंदर लगाना चाहिए ।

पौधा लगाने की विधि
पौधा रोपण के समय हाथ के अंगूठे एवं वर्तनी अंगुली का प्रयोग किया जाता. खेत में डाले गए निशान की प्रत्येक चौकड़ी पर एक पौधा रोपा जाता है. नर्सरी से निकाले पौधे की मिटटी धोए बिना लगाएं और धान के बीज सहित पौधे को ज्यादा गहराई पर रोपण नहीं किया जाता है. रोपाई के अगले दिन हलकी सिंचाई भी की जाती है ।

खरपतवार का नियंत्रण
इस विधि में प्रभावशाली खरपतवार नियंत्रण के लिए हाथ से चलाये जाने वाले विड़रों का इस्तेमाल किया जाता है. वीडर चलने से खेत की मिटटी हलकी हो जाती है और उसमे हवा का आवागमन ज्यादा हो जाता है. इसके अतिरिक्त खेतों में पानी न भरने देने की स्थिति में खरपतवार उगने को उपयुक्त वातावरण मिलता है. इस खरपतवार को अगर ज़मीन में दबा दिया जाये तो यह खाद का काम करती है. पौधे रोपण के 15-15 दिनों के अंतराल में वीडर चलाये जाने पर मिटटी में जीवाणुओं की क्रिया में वृद्धि होती ही और पौधों को अधिक मात्रा में पोषण मिलता है ।

सिंचाई एवं जल प्रबंधन
इस विधि में खेत में पौध रोपण के बाद इतनी ही सिंचाई की जाती है जिससे पौधों में नमी बनी रहे. परंपरागत विधि की तरह खेत में पानी भर कर रखने की आवश्यकता नहीं होती ।

कल्लों का निकलना
18 से 46 दिनों में धान के पौधे से सबसे ज्यादा कल्ले निकलते हैं क्योंकि इस समय में पौधों को धूप, हवा व पानी पर्याप्त मात्रा में मिलता है. वीडर के एक बार के प्रयोग से 15 से 25 कल्लों की संख्या प्राप्त हुई परन्तु उसके 3 बार के उपयोग से 1 पौधे से अधिकतम 80 कल्लों की प्राप्ति हुई ।

रोग व किट प्रबंधन

इस विधि से रोग व किटों का प्रकोप कम होता है क्योंकि एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी ज्यादा होती है. जैविक खाद का उपयोग भी इसमें सहायक है. कई प्राकृतिक तरीके और जैविक कीटनाशक भी कीट प्रबंधन के लिए उपयोग किये जाते हैं. कटाईपौधे की कटाई का समय पौधे के ऊपर निर्भर करता है । जब पौधे का तना हरा रहता है और बालियाँ पक जाती हैं तब कटाई की जाती है. इस समय बालियों की लम्बाई और दानों का वजन परंपरागत विधि के मुकाबले ज्यादा होता है और खाली दाने की संख्या कम होती है ।

श्री विधि से किसानों को कई लाभ मिलते हैं, जैसे की बीज की संख्या कम लगती है (एक एकड़ में 2 किलो) और पानी भी कम लगता है। इस विधि में मजदूर भी कम ही लगते हैं। परंपरागत तरीके की अपेक्षा खाद एवं दवा कम लगता है, प्रति पौधे कल्ले की संख्या ज्यादा होती है, बालिगों में दानों की संख्या ज्यादा होती है, दानों का वजन ज्यादा होता है और दो गुना उपज होती है

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